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कोयाबाना आदिवासी संस्कृति संवर्धन संस्थान : विरासत से भविष्य तक की नई पहल

*गोंडी भाषा सीख रहे 40 बच्चे, प्रतिदिन 20-25 लोग पहुंच रहे कोयाबाना* *संग्रहालय से आगे बढ़कर भाषा, संस्कृति, शोध और सामुदायिक रेडियो का बनेगा केंद्र* *स्थानीय इतिहास, लोककला और परंपरागत ज्ञान को नई पीढ़ी से जोड़ने की दिशा में जिला प्रशासन की पहल*

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BASANT SACHDEV
वरिष्ठ संवाददाता
43 दिन पहले 189 मिनट पढ़ें
कोयाबाना आदिवासी संस्कृति संवर्धन संस्थान : विरासत से भविष्य तक की नई पहल

उत्तर बस्तर कांकेर, 08 अगस्त 2026 / जिले की समृद्ध आदिवासी संस्कृति, परंपरा, लोककला, भाषा और विरासत को संरक्षित करने तथा आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की दिशा में ‘कोयाबाना आदिवासी संस्कृति संवर्धन संस्थान’ एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में उभर रहा है। जिला प्रशासन के सौजन्य से विकसित की जा रही यह पहल केवल एक संग्रहालय तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे कांकेर की सांस्कृतिक पहचान, इतिहास, भाषा और लोकज्ञान के जीवंत केंद्र के रूप में विकसित करने की परिकल्पना की गई है। कांकेर अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ समृद्ध आदिवासी जीवनशैली, लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक वेशभूषा, आभूषण, कृषि परंपराओं, हस्तशिल्प, लोककथाओं और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की अनूठी संस्कृति के लिए विशिष्ट पहचान रखता है। कोयाबाना इसी अमूल्य सांस्कृतिक विरासत को व्यवस्थित रूप से संजोने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास है। *40 बच्चे सीख रहे गोंडी भाषा* कोयाबाना की प्रमुख गतिविधियों में गोंडी भाषा शिक्षण विशेष आकर्षण का केंद्र है। वर्तमान में लगभग 40 बच्चे नियमित रूप से गोंडी भाषा सीख रहे हैं। इसके माध्यम से बच्चों को अपनी भाषा, लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। वहीं कोयाबाना की गतिविधियों और प्रदर्शित विरासत को देखने के लिए प्रतिदिन लगभग 20 से 25 लोग पहुंच रहे हैं। विद्यार्थियों, युवाओं, स्थानीय नागरिकों और अन्य आगंतुकों की बढ़ती रुचि इसे एक जीवंत सांस्कृतिक केंद्र का स्वरूप दे रही है। विरासत के विविध रूपों का संरक्षण कोयाबाना में कांकेर की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत को विभिन्न आयामों में प्रस्तुत किया जा रहा है। यहां ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक विरासत, आदिवासी जीवनशैली, पारंपरिक वस्त्र एवं आभूषण, कृषि उपकरण, लोककला एवं हस्तशिल्प, पारंपरिक आवास और जीवन पद्धति, ऐतिहासिक स्थलों की फोटो गैलरी, गोंडी भाषा तथा स्थानीय लोकज्ञान को व्यवस्थित रूप से प्रदर्शित एवं संरक्षित करने का कार्य किया जा रहा है। जिला प्रशासन की सामूहिक सोच का परिणाम कलेक्टर कांकेर के मार्गदर्शन में कोयाबाना को महज प्रदर्शनी स्थल न बनाकर जिले की सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने वाले जीवंत संस्थान के रूप में विकसित करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत के स्तर पर जनभागीदारी, स्थानीय समुदाय, कलाकारों और विभिन्न संस्थाओं के समन्वय से इसकी गतिविधियों को व्यापक स्वरूप देने के प्रयास किए जा रहे हैं। जिला प्रशासन द्वारा विद्यार्थियों को स्थानीय इतिहास, आदिवासी संस्कृति, लोककला और गोंडी भाषा से जोड़ने के लिए कोयाबाना को जीवंत शिक्षण केंद्र के रूप में विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। भविष्य में विद्यालयीन भ्रमण, सांस्कृतिक गतिविधियों और स्थानीय विरासत आधारित शिक्षण को विस्तार दिया , विद्यार्थियों की सहभागिता तथा स्थानीय ज्ञान को शिक्षा से जोड़ने के लिए आवश्यक समन्वय किया जा रहा है। भविष्य में रिसर्च सेंटर और सामुदायिक रेडियो की परिकल्पना कोयाबाना को भविष्य में आदिवासी संस्कृति, भाषा, लोककला, लोकसाहित्य, परंपरागत ज्ञान और स्थानीय इतिहास के अध्ययन एवं दस्तावेजीकरण के लिए शोध एवं रिसर्च सेंटर के रूप में विकसित करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। स्थानीय बुजुर्गों, कलाकारों, भाषा विशेषज्ञों और समुदाय के जानकारों की मौखिक परंपराओं तथा अनुभवों को दस्तावेज के रूप में संरक्षित किया जाएगा। इसके साथ ही सामुदायिक रेडियो स्टेशन की भी परिकल्पना है। इसके माध्यम से गोंडी भाषा, लोकगीत, लोककथाएं, पारंपरिक ज्ञान, कलाकारों की कहानियां और स्थानीय इतिहास को व्यापक स्तर तक पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा। इस तरह कोयाबाना आने वाले समय में संग्रहालय, भाषा केंद्र, सांस्कृतिक केंद्र, शोध केंद्र और सामुदायिक रेडियो के समन्वित मॉडल के रूप में विकसित हो सकता है। बच्चों के लिए किताबों से बाहर की जीवंत पाठशाला कोयाबाना का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना है। यहां बच्चे केवल पारंपरिक वस्तुओं को देखेंगे नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपी कहानियों को भी समझेंगे—पूर्वज कैसे रहते थे, खेती कैसे करते थे, कौन-से उपकरण इस्तेमाल करते थे, कौन-सी भाषा बोलते और कौन-से गीत गाते थे तथा प्रकृति के साथ उनका संबंध कैसा था। कोयाबाना इसी अनुभव को संस्कृति और इतिहास की जीवंत पाठशाला में बदलने की दिशा में एक सार्थक पहल है। यह पहल संदेश देती है कि विकास के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सुरक्षित रखना भी आवश्यक है। हमारी संस्कृति हमारी पहचान है, भाषा हमारी विरासत है, परंपराएं हमारा इतिहास हैं और लोकज्ञान आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य पूंजी है। “जहां इतिहास दिखाई देगा, संस्कृति सुनाई देगी, भाषा सीखी जाएगी, लोकज्ञान संरक्षित होगा और कांकेर की आदिवासी पहचान आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रहेगी।

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